हर गिरह दिल की खुलती गयी
जब खुद को उनसे बंधा पाया
रखे जिस हाल में भी, रह लेंगे
वो ही मेरा हमदम, वो ही सरमाया
बंद लबों से थी शिकायत कल तक
आज इनकी ख़ामोशी को सुनते हैं
बेइंतहा मोहब्बत करते हैं तुमसे
इन्होंने अभी-अभी है ये फ़रमाया
तू जो न कहे, तो भी हम सुन लेते हैं
तू जो न सुने तो भी अपनी कह लेते हैं
जिस्म दो हैं पर रूह एक हो जाती है
हमें तो इश्क़ ने बस यही है समझाया
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