मुन्तज़िर हूँ मैं उस रात का
जो इस कदर खामोश हो
के जब सो जाओ तुम,मैं दूर से बैठे बैठे
तुम्हारी सांस की लरज़िश सुपुर्दे जां कर लूँ।
वो रात तीरगी से भरी हो फिर भी
अपनी आँखों की मंद पड़ती चमक भर से
इक इक बूटा निहार लूँ तुम्हारे जिस्मे शज़र का।
इतनी रातें हैं बेशुमार ज़िंदगानी में
कितनी आइं हैं कितनी आएंगी
एक ख़ैरात में मिल जाए जो चुप्पी में ढली
लफ्ज़ बेमानी औ बातें बेअसर लगने लगें
धड़कनें काफ़िया,रदीफ़,बहर बन जाएं
तुम एक बेजोड़ ग़ज़लगोइ करते जाओ।
खुद से मिलने की रोज़ाना सफाराइ में
जुस्तजू एक ऐसी रात की बामकसद है
एक कोशिश है ये क़यास भर लगाने की
तुमसे होकर के खुद के क़रीब जाने की।।
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