हैवानियत है हर सूं वाबस्ता इंसान कहाँ है
फिरकों में बंटा आदमी ईमान कहाँ है
हर चेहरे पे मुयस्सर बेबसी और आंसू
वीरान है जहां, मुसर्रत का गुलिस्तान कहाँ है
ढूंढता हूँ एक पल का सुकून दौरे खूंरेज़ी में
कातिलों की बस्ती में मिलता मकान कहाँ है
बरसते हैं शोले, चमकती हैं बिजलिया
खोया है अमन वो नीला आसमान कहाँ है
बेदार होकर ही मिलेगी फतह नेकी को बदी पर
डगर है ये बड़ी मुश्किल आसान कहाँ है।।।।।
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