कभी हुआ करते थे तुम मेरे मनमीत
आज से हो बस एक सुनहरा अतीत
मृगतृष्णा समान है प्रेम का स्वरूप्
मिलन बिछड़न, यही है जग की रीत
पाया कुछ नही केवल खोया है मैंने
प्रेम में कभी होती है हार कभी जीत
विचारमग्न हूँ कि क्या होता है प्रेम
क्यों बन जाती है लत ये अजब प्रीत
बहुत ढूँढा इलाज प्रेम रोग का मैंने
अंततः मिली शान्ति सुनकर संगीत
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